नहीं था
दिल डूब रहा था कोई तिनका भी नहीं था
और नाखुदा कोई न हो ऐसा भी नहीं था
एक ख़्वाब बुना – तोड़ के किरचें समेट लीं
इस पूरे वाकये में मैं सोया भी नहीं था
चीज़ों को हम जो प्यार ना करें तो क्या करें ?
लोगों में कुर्ब का कोई क़तरा भी नहीं था
बस ये के सांय-सांय थी दिल में तुम्हारे बाद
कहने को कोई ख़ास मैं तन्हा भी नहीं था
अपनी उम्मीदों में ही कोई ज़्यादती रही
वैसे वो कोई इतना बेवफ़ा भी नहीं था
उस रात किवाडो पे एक दस्तक- सी सुनी थी
दर खोल के देखा – कोई साया भी नहीं था
देखो गुज़रते जा रहे हैं दिन के बाद दिन
तुम बिन कटेगी जिंदगी सोचा भी नहीं था …
~ भगवान थावरानी
बडी खूबी से और नजाकत से उनका ‘नहीं था’ हमारे दिल में सांय–सांय भर देता है ।
पूरी ग़ज़ल में इतना सूनापन और अंतिम शेर में, सहजता से वर्तमान का स्वीकार !
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વાહ.. વાહ… બન્ને ગઝલને વધાવુ છું.
બંને ગઝલો માણવા લાયક, વાહ.