ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया
ये इंसान के दुश्मन समाजों की दुनिया
ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
हर एक जिस्म घायल, हर एक रूह प्यासी
निगाहो में उलझन, दिलों में उदासी
ये दुनिया है या आलम-ए-बदहवासी
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
जहाँ एक खिलौना है इंसान की हस्ती
ये बस्ती है मुर्दा परस्तों की बस्ती
यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
जवानी भटकती है बदकार बन कर
जवां जिस्म सजते हैं बाजार बनकर
यहाँ प्यार होता है व्योपार बनकर
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
ये दुनिया जहाँ आदमी कुछ नहीं है
वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है
यहाँ प्यार की कद्र ही कुछ नहीं है
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
जला दो इसे, फूँक डालो ये दुनिया
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया
तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
~ साहिर लुधियानवी (8.3.1921-25.10.1980)

સાહિર સાબ નીઉતમ રચના સ્મ્રુતિવંદન 🙏🙏🙏
જમાનો બદલાયો પણ આ ગીત કાવ્યની કવિ વેદના એની એજ છે. ફિલ્મ જોતાં આંખ ભીની થાય એવું સત્ય રજૂ કર્યું છે.
એકદમ હૃદયસ્પર્શી.. સાહિર સાહેબનો જવાબ નથી…🙏🙏🙏
સાહિર સાહેબની ઉત્તમ કલમ દ્વારા ખૂબ માર્મિક કાવ્ય…! અને છેલ્લે સમાજને એક તમાચો કે મને આ દુનિયા પસંદ નથી… તમે જ સંભાળો આ દુનિયા…!
સમય ફાળવીને પ્રતિભાવ આપનારા મિત્રોનો ખૂબ ખૂબ આભાર.
‘કાવ્યવિશ્વ’ની મુલાકાત લેનારા મિત્રોનો પણ એટલો જ આભાર.
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